Monday, March 13, 2023

तुम थामे रहना हाथ

 समय के चक्रव्यूह में

घुटनों तक दल दल में फंसी

सोच रही हूं

क्या स्वयं से जूझने से बड़ा

होता है कोई युद्ध!


आकांक्षाओं, अपेक्षाओं से इतर

कोई नहीं है शत्रु

अपनी वर्जनाएं हैं अपने ही आदर्श

हठधर्मिता का कवच ओढ़ लेती हूँ कभी

और कभी सब हथियार डाल

नतमस्तक हो जाती हूँ समर्पित...

की अपनों से जीते हुए युद्ध

जीत कर भी हार जाते हैं हम

कभी अपने से कभी अपनों से।


उलझते लड़ते, दूर चली आयी हूँ

मिटने लगे हैं निशान कदमों के भी

भरे नहीं हैं लेकिन घाव 

पिछले युद्ध के।


कृष्ण हो तो सही तुम मेरे आसपास

किंतु मेरी दृष्टि मलिन नहीं  देख पाती 

तुम्हारा विराट रूप

प्रभु फिर भी थामे रहना हाथ

कि इस दलदल में सिवा तुम्हारे

कोई नहीं है साथ।

रही मन में...

 बहुत बातें थी करने को

मगर मैं कह नहीं पाई

रही मन में, जो मन की थी

कभी मैं बह नहीं पाई।


बरस बीते, उमर बीती

बीता बचपन,  तरुणाई

लगी हूँ भूलने अब तो

कि कब-कब याद तुम आई।

मगर ये तो कहो ना अब

कभी पहुंची थी तुम तक क्या?

दबी सिसकी जो छूटी थी

चीरती बांध सारे ही...

वो धब्बा तकिये पर सुरमई

कभी क्या देख पायीं थी?

बहा था काजल आँसू संग

कि तब से रीती हैं अँखियाँ...


हज़ारों ख्वाब सीने के

धूप संग मुरझाये थे जो

हरे रह सकते थे छाँव

आँचल की गर होती।

मैं अकसर सोचती हूँ माँ...

मैं क्या होती तुम्हारे संग जो होती

क्या बेहतर नींद ही होती जो

आँचल-छांव मैं सोती।


सभी कुछ है भरा-पूरा

मगर कुछ तो खलिश सी है

तुम्हारी आँख में भी तो 

आज भी कुछ नमी सी है।

ये कैसी ज़िद तुम्हारी है

बर्फ अब तक जमी क्यों है?

ये कैसी बर्फ है माँ

पिघल अब तक जो न पाई।

बहुत बातें थी करने को

मगर मैं कह नहीं पाई

रही मन में जो मन की थी

कभी मैं बह नहीं पाई।


भावना सक्सैना







विविधरूपा नारी


1.

नारी धरती 

सहेजे वक्षस्थल

अकथ नमी।

2.

नर्म पँखुरी

पल में मुरझाए 

मन नारी का।

3.

शुचि की द्युति

शतदल कमल

कांतिविहीन।

4.

पीत पर्ण सी।

तितर बितर हो

स्त्री की आकांक्षा।

5.

बहती रही

पीयूष स्रोत सम

 विषम में भी।

6.

धैर्य प्रतिमा

सह हर आघात

और निखरी।

7.

नारी कुशा सी

रौंदी जाती फिर भी

मस्तक ऊँचा।

8.

सोना बनता

तप कर कुंदन

ज्यों नारी मन।

9.

स्मृति मधुर

कभी करे विकल

हर्षाए कभी।

10

याद की बूंदें

नयनों की सहेली

बसें कोर पर।

11

बैरन यादें

दौड़ी आएं आँगन

देख अकेली।

12

यादें जो खिलें

हो मन सुरभित 

फैले सुवास।

13

याद डाकिन

दबे पाँव आती हैं

छीने सुकून।

14

मन आँगन

रोपा एक बिरवा

यादों के फूल।

15

कटी पतंग

लहरा आएं यादें

डोर के बिन।

16

मेघों का स्वर

सुन धरा आकुल

छोड़ो फुहार।

17

कंटक वन

बरसात की धूप

बींध डालती।

18

मोह बन्धन

अद्भुत अपूर्व है

 पाँव की बेड़ी।

19.

सौम्य सुंदर

गरिमामयी छवि

नमन तुझे।

20.

बिखरा देती स्त्री नर्म धूप

हर ओर उजास

स्त्री नर्म धूप।


हरिगन्धा मार्च 2023 महिला विशेषांक में प्रकाशित


कौन हूँ मैं

 कौन हूँ मैं!


कल पूछा था किसी ने

कौन हूँ मैं

सोच रहा हूं अभी तक 

अपना पता!

नाम हूँ क्या? 

या रिश्ता कोई?

कर्म से दूँ क्या पहचान बता?

कोई उपाधि, 

कोई तमगा, 

क्या करेगा परिभाषित!


अणु पुंज कोई

क्या बस देह यही…

या वो मन जिसको

नेह जल ने छुआ

कौन हूँ मैं

जानना स्वयं को बाकी अभी

किसी को क्या दूं अपना पता।


वक्त की रेत का

महीन कोई कण

अनन्त व्योम से 

स्वर एक टूटा हुआ

कतरा किसी एहसास का

कह दे कोई शायद

या किरण का किसी 

एक बिंदु कहीं छूटा हुआ


कृति ईश की

सागर में कश्ती सी

इससे और क्या

परिचय जुदा

अभक्त तो नहीं 

भक्त भी अभी हो न सका

चिरकाल से विचरा

रूपों में कईं

कौन  से रूप का दे दूँ मैं पता

कौन हूँ मैं

जानना स्वयं को बाकी अभी

किसी को दूँ क्या अपना पता!


Saturday, May 28, 2022

बहुत चाहा


बहुत चाहा फेयर रखूँ

ज़िन्दगी की नोटबुक को 

लेकिन हमेंशा रफ ही पाया...


कॉपी के उन आखिरी दो पन्नों की तरह

जिन पर होते हैं हिसाब अनगिन

हिसाब बिठाने की कोशिश में 

लेकिन, छूटा कोई हासिल

गुणा करते हुए, भाग ही पाया

बहुत चाहा...


दशमलव लगा जोड़े सिफर जब

अंतहीन सवाल कोई आया

प्रायिकता कोई खोजी कहीं तो 

शून्य उसका हासिल ही पाया

बहुत चाहा...


सजाने को जब-जब खींची लकीरें

अनचाहे निशानों से घिरती रहीं वे

घुमाया गोलाकार रेखा को जब भी

प्रश्नचिह्न जाने क्यों उभर आया

बहुत चाहा...


केंद्र से परिधि की त्रिज्या बनी तो

व्यास कोई सामने मुस्कुराया

सूत्र ढेरों रटते रहे पर

समय पर कोई काम न आया

बहुत चाहा....


सच मानो ये उलझा है बहुत

कोशिश की लाखों 

जिंदगी का गणित 

मगर समझ ही न आया

बहुत चाहा फेयर रखूँ

ज़िन्दगी की नोटबुक को 

लेकिन, हमेशा रफ ही पाया...


भावना सक्सैना

Monday, September 6, 2021

हिंदी बोलो रे!

 

हिंदी बोलो रे!

 

हिंद के निवासी हो तो हिंदी बोलो रे

प्रेम की ये भाषा है हिंदी बोलो रे

हिंदी बोलो, हिंदी बोलो, हिंदी बोलो रे

अरे भई हिंद के निवासी हो तो हिंदी बोलो रे

 

पूरब, पश्चिम, उत्तर दक्षिण, जोड़े सबको जो

सबको जो अपनाती है, वो हिंदी बोलो रे

राजभाषा ये तुम्हारी, मन की भाषा ये

तुमको इससे प्रेम है तो हिंदी बोलो रे

हिंदी बोलो, हिंदी बोलो, हिंदी बोलो रे

अरे भई हिंद के निवासी हो तो हिंदी बोलो रे

 

दूर-दूर फैली इसकी शाखाएँ अनेक

बोलियाँ असंख्य हैं, पर भाषा है ये एक

घर हो दफ्तर हो, या हो कोई देश,

डरो नहीं, झुको नहीं, हिंदी बोलो रे।

हिंदी बोलो, हिंदी बोलो, हिंदी बोलो रे

अरे भई हिंद के निवासी हो तो हिंदी बोलो रे

 

भाषा राजकाज की, भाषा ये संचार की

भाषा संविधान की, भाषा ये संस्कार की

गौरव है ये राष्ट्र का, आन-बान देश की,

इसको संग लेके चलो हिंदी बोलो रे।

हिंदी बोलो, हिंदी बोलो, हिंदी बोलो रे

अरे भई हिंद के निवासी हो तो हिंदी बोलो रे

 

ये सहज, ये सरल, ये सुबोध है,

इसमें नेह-प्रेम है, अपनत्व बोध है

केरल जाओ, असम जाओ, तमिल जाओ रे

इसकी सखियों को मिलाओ, फिर हिंदी बोलो रे

हिंदी बोलो, हिंदी बोलो, हिंदी बोलो रे

अरे भई हिंद के निवासी हो तो हिंदी बोलो रे।

 

भावना सक्सैना

Thursday, September 2, 2021

राजभाषा मन की भाषा है


राजभाषा बस नहींये तो मन की भाषा है,

एक डोर में बांधे सबको अभिलाषा है।

ये किरीट भारत काये है शान हमारी

इससे ही तो जग में है पहचान हमारी।

 

इसमें जुड़ती गुजरातीतामिल और मराठी

बाइस मिल पोषित करती हिंदी को प्यारी,

ये अक्षय-वट इसमें समाहित कितनी बोलियां

ये भारत के जन गण मन की आशा है।

 

ये देश-देश में फैली ले संस्कार हमारे

सींचा इसने कितनों कोकितनों को तराशा।

जुड़ जाता इसमें जब गौरव जन-जन के मन का

बन जाती संस्कृति की ये परिभाषा है।

 

एकता की उन्नति की तो यही राह है

इसमें सहजता, इसमें सुगमता और प्रवाह है

ये राष्ट्रप्रेम की जननी है, ये दक्षा है

जिसमें देखें हम खुद को ये वो शीशा है।

 

राजभाषा बस नहींये तो मन की भाषा है,

एक डोर में बांधे सबको अभिलाषा है।


भावना सक्सैना