Sunday, July 16, 2023

तमन्नाओं के जंगल

तमन्नाओं के जंगल 
सुर्ख होते जा रहे हैं
कत्ल हर रोज़ होती 
एक नई ख्वाहिश यहाँ पर
लहू रिसता जिगर से बूंद बनकर
मगर दरिया बहे ही जा रहे हैं।


ये मायावी शहर, 
कितनी है बारिश
हो मौसम कोई, 
यहां हर रोज़ बरसे
बचाया है बहुत छींटों से फिर भी 
ये दामन बस भिगोए जा रहे हैं।


बहुत चाहा कि तुमसे दूर हो लें
मगर बस में नहीं उद्दाम लहरें
जमाए पांव थे 
कस कर बहुत ही
किनारे फिर भी देखो 
छूटते ही जा रहे हैं।


कभी इनसे, क़भी उनसे
नींव शिकवों की गहरी है
रहा मन में गिला हरदम
मगर एक बात ये भी तो 
सोचकर कोई कुछ करता कहाँ है
हादसे बस हुए ही जा रहे हैं।


तमन्नाओं के जंगल 
सुर्ख होते जा रहे हैं...