Thursday, March 16, 2023

 शहर की व्यस्त 

सड़क के किनारे लगे 

उदास से लाल डिब्बे को देख 

मन हुआ एक चिट्ठी लिखी जाए।

कि तकनीक के इस दौर में

अरसा हुआ किसी से खतो खतावत हुए

भावनाओं में डूबे अल्फ़ाज़ों की नमी उतरी नहीं है बरसों से आंख में

ठहरा नहीं है मौसम शब्दों में कहीं


फिर ख़्याल... कि 

किसको लिखें भाव इस मन के

कौन ठहर कर गहेगा शब्दों को

आत्मसात करेगा उनमें छिपा वेग

उनमें छिपे ठहराव

तो सोचा...

खुद से खुद का ही है नाता अटूट

खुद से कहनी भी हैं अरसे से बातें कईं

एक लड़की गुम हो गयी है भीतर कहीं

वो अक्सर

हाँ अक्सर जो दिखती है

वो तो है ही नहीं...

तो लिखना है डूब कर

एक रोज़ खत खुद को ही

ये जानते हुए भी 

कि मन के हिस्से

लिखना आसान नहीं।

तुम भी किसी रोज़

ठहर कर किसी मोड़ पर

लिखना खुद को बातें मन की अनकही।


Monday, March 13, 2023

 घाम, पानी, शीत, आंधी 

वह सभी कुछ सह चुका है

वक्त का दरिया लबालब

उसके ऊपर बह चुका है।


पौ फ़टे से दिन ढले तक

अनगिनत जो देखे दृश्य

ज़र्रा ज़र्रा रक्त में मिल

धमनियों को गह चुका है।


थाम न पाती शिराएँ

जम गया जो स्नायुओं में

बरसों बरस जमता रहा

जाने क्या-क्या तह चुका है।


सफर के इस मोड़ पर

रीतती जाती हैं आँखें

कल्पना में था महल जो

वो कभी का ढह चुका है।


पर नहीं सब कुछ थमा है

देख कोंपल फिर हरी हैं

बस ज़रा सा नेह जल दे

प्राण इसमें नहीं चुका है।


लगे जब सब कुछ चुका सा

बहुत तब भी रहता है...

बात बस एक दृष्टि की है

मन मेरा यह कह चुका है।


तुम थामे रहना हाथ

 समय के चक्रव्यूह में

घुटनों तक दल दल में फंसी

सोच रही हूं

क्या स्वयं से जूझने से बड़ा

होता है कोई युद्ध!


आकांक्षाओं, अपेक्षाओं से इतर

कोई नहीं है शत्रु

अपनी वर्जनाएं हैं अपने ही आदर्श

हठधर्मिता का कवच ओढ़ लेती हूँ कभी

और कभी सब हथियार डाल

नतमस्तक हो जाती हूँ समर्पित...

की अपनों से जीते हुए युद्ध

जीत कर भी हार जाते हैं हम

कभी अपने से कभी अपनों से।


उलझते लड़ते, दूर चली आयी हूँ

मिटने लगे हैं निशान कदमों के भी

भरे नहीं हैं लेकिन घाव 

पिछले युद्ध के।


कृष्ण हो तो सही तुम मेरे आसपास

किंतु मेरी दृष्टि मलिन नहीं  देख पाती 

तुम्हारा विराट रूप

प्रभु फिर भी थामे रहना हाथ

कि इस दलदल में सिवा तुम्हारे

कोई नहीं है साथ।

रही मन में...

 बहुत बातें थी करने को

मगर मैं कह नहीं पाई

रही मन में, जो मन की थी

कभी मैं बह नहीं पाई।


बरस बीते, उमर बीती

बीता बचपन,  तरुणाई

लगी हूँ भूलने अब तो

कि कब-कब याद तुम आई।

मगर ये तो कहो ना अब

कभी पहुंची थी तुम तक क्या?

दबी सिसकी जो छूटी थी

चीरती बांध सारे ही...

वो धब्बा तकिये पर सुरमई

कभी क्या देख पायीं थी?

बहा था काजल आँसू संग

कि तब से रीती हैं अँखियाँ...


हज़ारों ख्वाब सीने के

धूप संग मुरझाये थे जो

हरे रह सकते थे छाँव

आँचल की गर होती।

मैं अकसर सोचती हूँ माँ...

मैं क्या होती तुम्हारे संग जो होती

क्या बेहतर नींद ही होती जो

आँचल-छांव मैं सोती।


सभी कुछ है भरा-पूरा

मगर कुछ तो खलिश सी है

तुम्हारी आँख में भी तो 

आज भी कुछ नमी सी है।

ये कैसी ज़िद तुम्हारी है

बर्फ अब तक जमी क्यों है?

ये कैसी बर्फ है माँ

पिघल अब तक जो न पाई।

बहुत बातें थी करने को

मगर मैं कह नहीं पाई

रही मन में जो मन की थी

कभी मैं बह नहीं पाई।


भावना सक्सैना







विविधरूपा नारी


1.

नारी धरती 

सहेजे वक्षस्थल

अकथ नमी।

2.

नर्म पँखुरी

पल में मुरझाए 

मन नारी का।

3.

शुचि की द्युति

शतदल कमल

कांतिविहीन।

4.

पीत पर्ण सी।

तितर बितर हो

स्त्री की आकांक्षा।

5.

बहती रही

पीयूष स्रोत सम

 विषम में भी।

6.

धैर्य प्रतिमा

सह हर आघात

और निखरी।

7.

नारी कुशा सी

रौंदी जाती फिर भी

मस्तक ऊँचा।

8.

सोना बनता

तप कर कुंदन

ज्यों नारी मन।

9.

स्मृति मधुर

कभी करे विकल

हर्षाए कभी।

10

याद की बूंदें

नयनों की सहेली

बसें कोर पर।

11

बैरन यादें

दौड़ी आएं आँगन

देख अकेली।

12

यादें जो खिलें

हो मन सुरभित 

फैले सुवास।

13

याद डाकिन

दबे पाँव आती हैं

छीने सुकून।

14

मन आँगन

रोपा एक बिरवा

यादों के फूल।

15

कटी पतंग

लहरा आएं यादें

डोर के बिन।

16

मेघों का स्वर

सुन धरा आकुल

छोड़ो फुहार।

17

कंटक वन

बरसात की धूप

बींध डालती।

18

मोह बन्धन

अद्भुत अपूर्व है

 पाँव की बेड़ी।

19.

सौम्य सुंदर

गरिमामयी छवि

नमन तुझे।

20.

बिखरा देती स्त्री नर्म धूप

हर ओर उजास

स्त्री नर्म धूप।


हरिगन्धा मार्च 2023 महिला विशेषांक में प्रकाशित


कौन हूँ मैं

 कौन हूँ मैं!


कल पूछा था किसी ने

कौन हूँ मैं

सोच रहा हूं अभी तक 

अपना पता!

नाम हूँ क्या? 

या रिश्ता कोई?

कर्म से दूँ क्या पहचान बता?

कोई उपाधि, 

कोई तमगा, 

क्या करेगा परिभाषित!


अणु पुंज कोई

क्या बस देह यही…

या वो मन जिसको

नेह जल ने छुआ

कौन हूँ मैं

जानना स्वयं को बाकी अभी

किसी को क्या दूं अपना पता।


वक्त की रेत का

महीन कोई कण

अनन्त व्योम से 

स्वर एक टूटा हुआ

कतरा किसी एहसास का

कह दे कोई शायद

या किरण का किसी 

एक बिंदु कहीं छूटा हुआ


कृति ईश की

सागर में कश्ती सी

इससे और क्या

परिचय जुदा

अभक्त तो नहीं 

भक्त भी अभी हो न सका

चिरकाल से विचरा

रूपों में कईं

कौन  से रूप का दे दूँ मैं पता

कौन हूँ मैं

जानना स्वयं को बाकी अभी

किसी को दूँ क्या अपना पता!