Tuesday, June 9, 2020

ये बदले से दिन



मौन संवेदनाएं
व्यक्त होती थी एक आलिंगन से,
एक स्पर्श कह जाता था
सब मन के भाव..।
वो जादू की झप्पी
जो रूठों को मनाने के काम आती थी
कितना कुछ खो दिया इस साल में।

मास्क लिपटे चेहरों पर
मुस्काने नहीं दिखती
आँखों मे बसा है भय संशय
जिसने ठेल दिया मुस्कानों को
दरवाज़े की घण्टी बजते ही
तन जाती हैं भौहें...
एक दूसरे पर जाती है दृष्टि
मन मे सवाल उत्पन्न करती
हाथ पहले बढ़ते थे दुपट्टे की ओर
अब मास्क उठाते हैं यंत्रवत।

नवजात के परिवार में आते ही
दौड़ जाते थे पाँव
उसे देखने, असीसने और
गोद मे झुलाने
अब फोटो और वीडियो कॉल
देते हैं तसल्ली...
कहाँ दें पाएंगी
आभासी मुलाकातें वो खुशी
जो उसे बांहों में भर होती,
सहमे हुए रिश्ते
दूर खड़े हो देखते हैं
फ़िक्रमंद अपने से
अपनों के लिए
कितना कुछ बदल गया है।

Bhawna Saxena

Wednesday, June 3, 2020

क्षणिकाएँ

1.
धूप से तुमको बचाया
हुलसी तुम्हारी छाँव में
बाँध ली ज़ंजीरें खुद ही
उसने अपने पाँव में

2.

कल उलीचा था बहुत
मन से धुँआ जाता नहीं है
हो शमा कितनी भी रोशन
मन जगमगाता ही नहीं है।

ठहरा मनुज

नदी कलुषित थी बहुत
ठहरा मनुज,
गर्द सारी बह गई
साँस घुटती थी जिसमें
वायु भी तो स्वच्छ
स्वयं ही हो गई
है धरा निखरी नई सी
सुबह शीतल ताज़गी है
रात ओढ़े तारे जगमग
खिले-खिले बाग उपवन
हो रहे हर्षित सभी
ज़िन्दगी सहमी हुई बस
फिर भी कहना है यही
वक्त थोड़ा और ठहर
मैल मन में है अभी...
है अति आडम्बर की
सोखनी है विनय अभी
स्व को अब तक पोसता जो
बीजने को करुणा उसको
वक्त लगेगा अभी
मैं मेरे के फेर से पाए निकल
उस ठौर का रास्ता बड़ा लम्बा अभी।

ताकि सनद रहे

बड़ी कॉलोनियों के सुरक्षित भवनों में
भरे पेट समाचारों की जुगाली करते ज्ञानी
नहीं समझ पाएंगे क्यों जुट जाती है भीड़
आनंद विहार और बांद्रा पर
सर पर गठरी-पोटली  उठाए
डामर पर चलते सूजे हुए पांवों का दर्द
और मन में धंसी फांस की चुभन
उन्हें भेद नहीं पाएगी
वे गरियाएँगे उनकी बेअकली पर
पाठ पढ़ाएंगे दूरी और मास्क के
बताएंगे मुफ्त राशन और भोजन की स्कीमें...

इन सबसे परे
चलते रहेंगे कुछ पाँव, कि
उन्हें नहीं आती सियासत
वे बस घर की सोचते हैं
और चल पड़ते हैं
अपने घर सर पर उठाए
उन्हें डर बीमारी से नहीं
भूख की भी आदत है उन्हें
वे डरते नहीं भूख से
डर है बड़े शहर में लावारिस मौत का
हर तरफ सुरसा सी मुँह फैलाए
उसमें समा जाने के पहले
वो देखना चाहते हैं
अपने दुधमुंहे का मुँह
छूना चाहते हैं उस दीवार को
जिसके लिए दो महीने पहले ही
 किया था मनी आर्डर
वो जानते हैं कि मृत्यु रुकती नहीं
लेकिन मरना चाहते हैं अपनों के बीच
ताकि सनद रहे नातेदारों को कि
दुनिया से कूच कर गए हैं।

बची रहेगी धरा

बची रहेगी धरा

मैं और तुम
जब बैठे हैं सुरक्षित घरों में
कुछ लोग जूझ रहे है
विकट परिस्थितियों में
वो थामे हैं मानवता,
स्वार्थ को कर किनारे ज़रा
बस उन्हीं के जीवट से बची रहेगी ये धरा

बिखरते तिनकों को
समेट सहला रहे हैं जो
उनकी बातों में जादू है झोले में दवा
वक्त कैसा भी आए बुरा
उनसे टकरा कर जाएगा बिखर
वो रोपते रहेंगे विश्वास
और बची रहेगी ये धरा।

कुछ बीज रोपे थे
नरम हथेलियों ने मिट्टी थपका
एक रोज़ आँधियां जब आतुर हो
गिराने लगेंगी सूखे दरख़्त पुराने
नए पौधे फैलाकर जड़ें अपनी
बांध लेंगे मृदा
उन मासूम हथेलियों की
ऊष्मा से बची रहेगी ये धरा।

राजनीति एक दूसरे को गिराने जब
खोज रही होगी तुरुप का इक्का
बुद्धिजीवी जब गढ़ रहे होंगे सिद्धांत
देश के किसी कोने में चुपके से
देकर लहू अपनी शिराओं से
कोई सैयद बचा लेगा एक सुलोचना
जिसे सुन हर कोई उठेगा मुस्कुरा
बस इसी मुस्कान से बची रहेगी ये धरा।

हज़ार नफरतों के बीच
रहेंगे कुछ हाथ
जो बिन पूछे धर्म और जात
बांटते रहेंगे प्रेम
और जीती रहेगी उम्मीद
एक कतरा प्रेम मुट्ठी में भींच
उसी कतरे में श्वास ले
जीत जाएगी वक्त से और जीती रहेगी धरा।

घर खुश है

दीवारों के रंग खिल रहे हैं
वे नेहभरी नज़रों में नहाई हैं
घर खुश है कि अब तक
उसे संवारा जाता था
अब उसमें रहा जा रहा है।

गमलों के पौधे मुस्कुरा उठे हैं
उन्हें दिल से पुकारा जा रहा है
रसोई में उठ रही, सौंधी महक
आनंदित हो  रहा है घर
उसमें जीवन निखारा जा रहा है।

कहीं किलकारियां हैं
अनहद नाद कहीं
चहकते, मचलते बालकों की
बातों से, गीतों से घर खुश है,
हर कोना गुनगुना रहा है।

सज रही हैं दीवारें इस मौसम
रंग कागज़ पर उतार कहीं
दिन संवारा जा रहा है
घर खुश है उसमें
इंद्रधनुष उतारा जा रहा है।

हौसले की तदबीरें

आसमान साफ है
और उस में स्पष्ट है
भविष्य पर लगा
बड़ा काला प्रश्नचिह्न
जिसके पार फैला है
अंतहीन कोहरा।
टेलीविजन भरा हुआ है
मौत, उदासी, भूख और
बेबसी की तस्वीरों से
बेइंतेहा दुखों और
दूर तलक पसरी उदासी की
घनघोर घटाओं के बावजूद
मैं नहीं लिखूंगी
आँसुओं के गीत।

मैं नहीं कहूंगी कि
खतम हो चली है इंसानियत
क्योंकि जो बचा है
वही इंसानियत है
वही करुणा है
और वही है प्रेम।
यकीन मानो न होता
तो कुछ बचा ही न होता।

मन होता तो है उद्वेलित
तब कस लेती हूँ जिरह बख्तर
मजबूत करती हूँ दुर्ग मन का
कि अनचीन्हा भेद न पाए
होते ही चाक-चौबंद
सहसा भीतर से कह उठता कोई
सुनो... यहाँ रुकना मत
तुम लाँघ जाना
इस मीलोमील पसरे
कोहरे भरे आसमान को
उस आशा के पंख पर तिर
जिसे रखता है मन सहेज
घोर अंधेरों में महफूज़
कि अभी लिखनी हैं
हिम्मत और आशा की तदबीरें
लिखनी हैं पातियां
उन योद्धाओं के नाम
जो डटे हैं छोड़ अपने घर बार
तुम जो ठहरे हो
उन्हें बल मिलता है
कि ज़िन्दगी दरिया है
जो बहता रहता है।
कि हौसले की नाव पर
सवेरा रहता है।

सरकार चिंता में है
किंतु संतुष्ट है कि
"लोग कम मर रहे हैं"
मुझे कम सुनाई नहीं देता
सिर्फ सुनाई देता है
"लोग मर रहे हैं"

सिखा समझा दिया सरकार ने
कितने दिन रखेंगे ,
तुमको ही करना है सम्भाल...
दूरी, संयम उन्हें समझ नहीं आता
वे बस सुनते हैं
लॉकडाउन खुल रहे हैं।

उन्हें नहीं आता संयम से रहना
बाड़े से छूटे भूखे हैं वे
ज़िन्दगी में फिर रस आ गया
जब से सुना अर्थव्यवस्था
सशक्त करने के रास्ते खुल रहे हैं

अकेले...असहाय, निरुपाय
घर को निकले थे वे पाँव-पाँव
थक कर क्या लेटे
उठ नहीं पाए फिर कभी
सुना तो उन्होंने यही था
रेल के पहिये नहीं चल रहे हैं।

रेल नहीं थी काल था वो
पीछा कर रहा था
रूप बदल कहीं भी धरता है
लोमहर्षक सच तो यही है
विमर्श हाँ, कई चल रहे हैं।

भूख, महामारी, गैस रिसाव
सृष्टि रच रही है जाल कई
अब धरती पर जल कम है
प्रलय के शायद
रूप नए निकल रहे हैं।

Bhawna Saxena