Monday, August 31, 2009

सपने

मंजे बरतनों के धुलने पर
कुछ बहते हैं,
कुछ बह जाते हैं,
कपड़े धुलने पर,
फिर भी अटके रहते हैं....
कोनों में
सपने, कल्पनाएं और उनके पर।
बुहार-बुहार परे करती हूँ
छिटकते रहते हैं
कागज के टुकड़ों से फिर भी,
सपने चिपके ही रहते हैं,
संग-संग जीवन भर

1 comment:

Amit K Sagar said...

वाह. प्योर्ली अल्टीमेट. बहुत सही लिखा है आपने. बहुत खूबसूरत. जारी रहें.
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