Thursday, August 2, 2018

तृणमात्र


तृणमात्र हैं बस इस जगती में
जिनको ले समय की धार बही
पर लड़ मरते उन बातों पर
जो चुनने का अधिकार नहीं।

कभी धर्म कभी देह पर धर
छिछली बातें करने वाले
मानवता के सहज गुणों से
रखते हैं कुछ सरोकार नहीं।

हर्शाए रहते उथली सतह पर
बातों में कुछ आधार नहीं
जाने लेकिन न समझें  कभी
प्रतिशोध से चले संसार नहीं।

वो खेल सियासी में भूले
पैशाचिकता प्रतिकार नहीं
नर पिशाचों की देश तो क्या
धरती को भी दरकार नहीं।
भावना सक्सैना

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