Monday, March 9, 2015

वक्त - क्षणिकाएं

मौन प्रश्न 
पाएं न उत्तर
वीरान निगाहों में 
कितना बेबस 
कितना कातर 
इंसा वक्त की बाहों में।

x-x-x
टुकड़ा टुकड़ा
कतरा कतरा
जीवन बीना
भरी टोकरी
खूब सहेजा
रह जाएगा बिखरा सब ही
वक्त की राहों में.....


x-x-x
लम्हे जो छप गए दिल पर
उम्र बीते वो बीतते ही नहीं,
ज़ख्मों से रिसता है दर्द
कुछ गम हैं जो रीतते ही नहीं,
वक्त ही नश्तर वक्त ही मरहम 
वक्त से हम कभी जीतते ही नहीं।

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