Friday, October 30, 2009

परिवर्तन



एक रोज़ तमन्ना थी.......


आसमां छू लेने की।


वो तमन्ना आज भी है


की छू लूँ मैं आसमां


पर लगने लगा है .........


लाके कोई रख दे


उसे मेरे सिरहाने।

2 comments:

अभिषेक आर्जव said...

क्या यह हार नही ?

bhawna said...

हाँ यह हार है, किंतु जीवन की यही परिणति है........... और शायद नियति भी।